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बाजीराव मस्तानी: फिल्म समीक्षा


16 December 2019 | By hiadmin | SISU

१४ दिसंबर २०१५ को रिलीज़ हुई 'बाजीराव मस्तानी' भारतीय ऐतिहासिक रोमांस फ़िल्म है। इस फ़िल्म के दो मुख्य किरदार हैं बाजीराव और मस्तानी, फ़िल्म उन दोनों की प्रेम कहानी के बारे में है।

कहानी बाजीराव के पेशवा बनाने से शुरू हुई है। मराठा समराज्य के लिए लडते थे और उसका सपना है हिंदू स्वराज। जब बाजीराव सिरोनजा जाने की तैयारी कर रहा था, तब मस्तानी उससे सहायता माँगने के लिए बुनेदलखंद से आई। बाजीराव को मस्तानी की हिम्मत और उसकी मदद माँगने की अंदाज पसंद आयी इसलिए उसने अपनी सेना लेकर मस्तानी के साथ बुनेदलखंद को दुश्मन के घेरने से बचाया, लेकिन युद्ध में मस्तानी बाजीराव की रक्षा करने के लिए घायल हो गई। इस बात से बाजीराव ने मस्तानी से मोहब्बत की तथा मस्तानी भी इश्क़ की नदी में डूब गई। राजकुमारी होते भी मस्तानी को अपनी तक़दीर ख़ुद लिखनी थी, तब वह मराठा ई। हालाँकि बाजीराव के पास काशी नामक पत्नि थी और बाजीराव की माता जी भी अपने हिंदू पुत्र के मुस्लिम मस्तानी के साथ शादी करने से असहमत थी, वे चाल चलाती थी ताकि मस्तानी बाजीराव से न मिले। किसी तरह उन्होंने विवाह किया, साथ साथ अन्य परिवार के सदस्यों के खिलाफ लडने की कोशिश की। बाजीराव ने जिवनभर उतने युद्ध लड़े कभी भी नहीं हारा, लेकिन एक बार की विभक्ति से वह मृत हो, उसकी तलवार की ताक़त हजारों बार दुश्मनों को मारा, लेकिन इस बार अपनी प्राण को नहीं बचाया। बाजीराव की मृत्यु के साथ मस्तानी ने भी इस दुनिया से विदा किया, जैसे क़िस्मत में ये सब तय हुआ है।

कोई संदेह नहीं कि निदेशक, अभिनेता-अभिनेत्रियों और अन्य कर्मचारियों ने बड़ी मेहनती की। इस फ़िल्म के संवाद, गीत दर्शक के कानों को सुख देते हैं, भव्यता और शोभा से भरे हुए दृश्य भी यादगार हैं। पर इस बात पर शक तो हो सकता है कि क्या ऐसा प्रेम, जो फ़िल्म में लगातार दर्शकों को दिखाया जाता था, जिसके लिए नायक जी भी सकता और मर भी सकता है , यहाँ तक कि दूसरों को कष्ट और दुख भी देता है, ठीक मान सकते हैं?  बाजीराव और मस्तानी का यह प्रेम शायद धर्म से, जीवन से ऊपर हो, साथ भी स्वार्थी और संकीर्ण सा है। मस्तानी से मिलने से पहले ही बाजीराव ने एक ख़ुशहाल छोटा परिवार बना रखा था, क्या मस्तानी को यह बात पता होने के बाद भले ही थोड़ी दुविधा में पड़ी? क्या बाजीराव ने अपनी पत्नी के लिए कुछ भी सोच रखी? नहीं। क्या काशी ने कोई ग़लती की? नहीं। काशी को केवल अपने पर पड़ा अन्याय सहन करना पड़ता।

ईमानदारी से कहा जाए तो बाजीराव मस्तानी एक अच्छी फ़िल्म है, लेकिन जब हम यह फ़िल्म देख रहे हैं, तब हम ज़रूर ध्यान दें कि हमें स्वतंत्र रूप से सोचने की आवश्यकता है ताकि हम विचार की लहरों में अपने आप को न खो दें। (Gu Shan/पद्मा)

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