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भारत-चीन सम्बन्ध:नई सोच, नई संभावनाएं


15 April 2018 | By hiadmin | SISU

 

दोनों देशों ने शिक्षा, संस्कृति, खेल, युवा मामले, शहरी नियोजन, जल प्रबंधन, बुनियादी ढांचे, पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, व्यापार और वाणिज्य के आदान-प्रदान में तालमेल के लिए खास ध्यान दिया है।

चीन द्विपक्षीय व्यापार के मामले में किसी भी देश के साथ एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार हैं। भारत-चाइना द्विपक्षीय संबंधों पर अगर नज़र डालें तो हम देखते हैं कि लोकप्रिय मीडिया में ज्यादातर चर्चाएं सीमा विवाद पर ही होती रही हैं। लेकिन हाल के वर्षों में यह स्थिति बदलती हुई नज़र आ रही है। हम देखते हैं कि चीनी राष्ट्राध्यक्ष शी चिनफिंग और भारतीय प्रधानमंत्री कई बार विभिन्न मौकों पर मिल चुके हैं। दोनों नेताओं के बीच का विश्वास वीसा उदारीकरण  में परिलक्षित होता है। लोगों के बीच का संपर्क के लिए दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और चीन में पढ़ रहे भारतीय छात्रों की संख्या १३५०० के पार जा चुकी है। भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार घाटा साल २०१५ में बढ़ते हुए ५१.८६ अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुच चुका है, जोकि व्यापार के दृष्टिकोण से चिंता का प्रमुख कारण है। हालाँकि दोनों देशों ने इस समस्या के समाधान के लिए भी सालाना भारत-चीन सामरिक आर्थिक संवाद का तंत्र स्थापित किया है।

भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों को गति इस बात से भी मिली है कि दोनों देशों ने कर्नाटक-सिचुआन और गुजरात-गुआंगडोंग के बीच सिस्टर-प्रान्त के दर्जे को स्थापित किया है। इतना ही नहीं, बेंगलुरू-छंग्दू, चेन्नई-छोंग्छिंग, अहमदाबाद-गुआंगजोऊ, हैदराबाद-छिंगताओ, औरंगाबाद-तुन्हवांग, कोलकाता-कुनमिंग और दिल्ली-पेचिंग के बीच सिस्टर शहर के दर्जें को स्थापित किया गया है। 

दोनों देशों ने शिक्षा, संस्कृति, खेल, युवा मामले, शहरी नियोजन, जल प्रबंधन, बुनियादी ढांचे, पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, व्यापार और वाणिज्य के आदान-प्रदान में तालमेल के लिए खास ध्यान दिया है। थिंक-टैंक प्रतिनिधि मंडलों और मीडियाकर्मियों के बीच संपर्क को बढ़ाने के लिए प्रयास किए गए हैं। इसी क्रम में ख़ास करके धार्मिक पर्यटन के सम्बन्ध में दिखाया गया प्रोत्साहन प्रशंसनीय है। इतना ही नहीं, दोनों देशों के सेनाओं के बीच संचार को बढ़ने के लिए और नेताओं के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए हॉटलाइन की संख्या भी बढाई गई है। पूर्व भारतीय विदेश सचिव एस. जयशंकर के अनुसार आज हम एक महत्वपूर्ण भू-राजनितिक दोराहे पर खड़े हैं, जहाँ से पूर्वी एशिया के साथ आर्थिक एकीकरण न केवल दक्षिणी-पूर्वी एशिया, बल्कि समूचे एशियाई परिदृश्य को बदल सकता है। भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापारिक सम्बन्ध एक बहुध्रुवीय और बहुपक्षीय एशिया की नींव रखने की तरफ मील का पत्थर साबित हो सकती है।

भारत जहाँ मेक-इन-इंडिया परियोजना के अंतर्गत विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के उद्योगों के बीच वैश्विक हब बनना चाहता है। वहीं दूसरी तरफ चीन भी पश्चिमी विकास अभियान के अंतर्गत सिचुआन, गान्सू , छिंगहाई और युन्नान जैसे कम विकसित पश्चिमी चीनी प्रान्तों को आर्थिक उत्पादन का नया केंद्र बनाना चाहता है। यह एक सोची समझी नीति है जिसके अंदर चीन अपने पूर्वी प्रान्तों की उत्पादन क्षमता और आधार केंद्र को पश्चिमी प्रान्तों में वितरित करना चाहता है।

वहीं भारत भी मेक-इन-इंडिया परियोजना के अंतर्गत श्याओमी-फाक्सकॉन की असेंबली लाइन का भारतीय शहर चेन्नई में स्थान्तरण एक सकारात्मक पहल है जो भारतीय अर्थव्यस्था को भी गति प्रदान करेगा। हुआवेइ, हाएर, लेनोवो जैसी चीनी स्मार्टफ़ोन कंपनियां पहले से ही भारतीय बाज़ार में लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं और  श्याओमी तो पूरे एशिया में नंबर एक स्मार्टफ़ोन कंपनी पिछले साल बन चुकी है जिसका पूरा श्रेय भारतीय बाजार में इसकी बिक्री को जाता है। इतना ही नहीं, पिछले कुछ महीनों में चीनी ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा, भारतीय ई-कॉमर्स मोबाइल कंपनी पेटीएम के साथ एक आर्थिक रूप से सफल साझेदारी कर चूका है। इस तरह के कई सारे आर्थिक समझोते हाल के दिनों में देखने को मिल रहे हैं, चीन की आर्थिक मंदी का बेहतरीन विकल्प तो है ही, साथ ही साथ भारतीय अर्थव्यस्था को और गति प्रदान करेगा।

उल्लेखनीय आज यह है कि अमेरिका-चीन के व्यापार-युद्ध के मध्य भारत की विदेश नीति को आज चीन के साथ आर्थिक साझेदारी की उतनी ही ज़रूरत है जितनी दुनिया के अन्य देशों के साथ सुरक्षा और सामरिक संबंधों की। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि भारत-चीन द्विपक्षीय सम्बन्ध एक ही साथ सहयोग और प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रहे हैं।

अंत में, निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि इक्कीसवीं सदी को एशियाई  सदी बनाने और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को नया आकार देने की दिशा में काम करने के लिए, दोनों देशों को जी-२०, ब्रिक्स, एससीओ, डब्लूटीयो जैसे बहुपक्षीय मंचों पर विकासशील देशों के हितों की रक्षा और अगुआई एक साथ मिलकर करने की जरूरत है जोकि आज के दौर की सबसे अहम् वैश्विक राजनीतिक पहलू में से एक है।

   (लेखक सुदीप कुमार इस समय ईस्ट चाइना नार्मल यूनिवर्सिटी (ECNU) में चीनी राजनीती पर शोधार्थी हैं।) 

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